॥ दोहा ॥
श्री हरि विष्णु भगवान को, प्रणाम करूं शीश नाय।
पालनहार जगत के, शरण तुम्हारी आय॥
॥ चौपाई ॥
जय जय विष्णु लक्ष्मीपति स्वामी।
जय नारायण अंतरयामी॥
क्षीर सिंधु में करत विलासा।
शेषनाग पर करत निवासा॥
चार भुजा चारों में धारी।
शंख चक्र गदा पद्म धारी॥
पीताम्बर शोभित तन साजे।
मुकुट किरीट मस्तक पर राजे॥
कौस्तुभ मणि उर में सोहे।
वनमाला गल शोभा मोहे॥
लक्ष्मी सदा चरण सेवकाई।
ब्रह्मा सेवें पद कमलाई॥
नारद मुनि तव गुण गुणगाना।
सनकादिक तुम्हें ब्रह्म बखाना॥
सहस नाम तव वेद बखाने।
सहस्र शीश फण शेष पुराने॥
दशावतार धारि जग तारा।
असुर निकंदन किया विचारा॥
मत्स्य रूप धरि वेद बचायो।
हयग्रीव को मारि गिरायो॥
कच्छप रूप धरि मंदर धारा।
समुद्र मंथन कष्ट निवारा॥
वाराह रूप धरि भू उद्धारी।
हिरण्याक्ष मारा महारी॥
नरसिंह रूप किया अवतारा।
हिरण्यकशिपु को विदारा॥
प्रहलाद उबारा भक्त तुम्हारे।
खंभे फाड़ प्रकट हो न्यारे॥
वामन रूप धरा बलि द्वारे।
तीन पग में त्रिभुवन निहारे॥
परशुराम रूप धरि आये।
इक्कीस बार क्षत्रिय मारि गिराये॥
श्री राम रूप धरि अवतारी।
लंकापति रावण संहारी॥
कृष्ण रूप धरा द्वापर आये।
कंस मारि मथुरा में छाये॥
गीता ज्ञान जगत में दीना।
अर्जुन को उपदेश नवीना॥
बुद्ध रूप धरि करुणा लायो।
अहिंसा धर्म जगत में फैलायो॥
कलियुग अंत कल्कि अवतारा।
पापियन को करें संहारा॥
अनंत अनादि परम पुरुषोत्तम।
सकल सृष्टि के स्वामी उत्तम॥
सत्व गुण रूप पालन करता।
जगत का पालन भार तू धरता॥
तीन लोक में व्याप्त तुम्हारी।
सकल जगत की शक्ति न्यारी॥
जल में थल में गगन विराजो।
सर्वत्र तुम्हीं प्रभु साजो॥
जो जन तुम्हें भजे मन लाई।
भव सागर से तरहिं तुरंताई॥
ध्रुव प्रहलाद जनक मुनि गाये।
नारद शुक सनकादिक पाये॥
भक्त वत्सल तुम दीन दयाला।
करुणा सिंधु कृपा के लाला॥
गज राज की लाज जो राखी।
ग्राह से बचाई जग साखी॥
द्रौपदी के चीर बढ़ाये।
भक्तन की लाज सदा बचाये॥
सुदामा को महल दिये थे।
तंदुल के बदले सुख लिये थे॥
विभीषण को लंका दीनी।
भक्ति देख कृपा प्रभु कीनी॥
अहिल्या जो पाषाण भई थी।
राम चरण रज से सजी थी॥
संकट हरण मंगल करण।
विघ्न विनाशन भय हरण॥
जो कोई नर विष्णु गुण गावे।
सो निश्चय परम पद पावे॥
विष्णु चालीसा जो नर पढ़हीं।
सब सुख भोग मोक्ष पद गढ़हीं॥
रोग शोक दुख दूर होय सब।
विष्णु कृपा मिले तब तब॥
पुत्र दारा धन धान्य पावे।
विष्णु भजन से घर सुख आवे॥
जो एकादशी व्रत करें धारी।
विष्णु कृपा से भवन उजारी॥
तुलसी दल प्रिय विष्णु को भावे।
नित पूजा से कष्ट मिटावे॥
॥ दोहा ॥
विष्णु चालीसा पाठ करि, करें प्रणाम अनेक।
जो मांगे सो पाईये, फल मिले अनेक॥
नारायण नारायण जय गोविंद हरे।
नारायण नारायण जय गोपाल हरे॥
॥ इति श्री विष्णु चालीसा समाप्त ॥