॥ दोहा ॥
जय जानकी जय सीता माता, जय रघुवर की प्रिया।
पतिव्रता शिरोमणि तुम, करो कृपा अभया॥
॥ चौपाई ॥
जय सीता माता जय जानकी।
जय रामप्रिया जय मिथिला रानी की॥
जय जनकसुता जय भूमि दुलारी।
जय पतिव्रता जग में सुखकारी॥
राजा जनक की तुम प्यारी बेटी।
हल चलाते भूमि से मिली हैं नेती॥
भूमिजा नाम भी तुम्हारा प्यारा।
धरती माता का अंश निहारा॥
मिथिला नगरी में जन्म तुम्हारा।
वैदेही नाम जग में न्यारा॥
सुनयना माता ने पाला प्यार से।
राजकुमारी बनी संस्कार से॥
शिव धनुष भंग का वृत्त सुहावे।
स्वयंवर में राम जी आवे॥
राम ने शिव धनुष तोड़ा भारी।
जयमाला पहनाई जानकी प्यारी॥
राम सीता विवाह अति शोभा पायो।
चारों भाई का विवाह करायो॥
अयोध्या आई बहू बनकर।
कौशल्या ने लिया गोद में धरकर॥
पतिव्रता धर्म का पालन किया।
राम चरणों में जीवन दिया॥
वनवास में संग राम के आई।
चौदह वर्ष विपदा सहि भाई॥
चित्रकूट में कुटिया बसाई।
पंचवटी में वास करे आई॥
स्वर्ण मृग का रूप रावण लायो।
मारीच को भेज छल कमायो॥
लक्ष्मण रेखा पार न करना।
राम ने कहा था यह आदेश धरना॥
रावण साधु वेष में आयो।
सीता माता को छल से ले जायो॥
जटायु ने रोका रावण को।
किंतु रावण ने काटे पंख उसको॥
अशोक वाटिका में कैद रही माता।
रावण की धमकी सुनी विधाता॥
त्रिजटा राक्षसी ने साथ दिया।
सांत्वना और आश्वासन दिया॥
एक वर्ष कष्ट में बीते दिन।
राम नाम जपती रहीं निज मन॥
हनुमान जी आये अशोक वन।
राम की मुद्रिका दी पहचान॥
सीता ने चूड़ामणि दी भेजी।
राम के पास संदेश प्रेषी॥
राम ने वानर सेना सजाई।
समुद्र पर सेतु बनाई॥
लंका पर चढ़ाई हो गई।
रावण वध से विजय भई॥
अग्नि परीक्षा से शुद्ध भई माता।
अग्नि देव ने दी अयोध्या जाता॥
पुष्पक विमान से अयोध्या आई।
राम राज्याभिषेक में शोभा पाई॥
राम राज्य में सुख से रही माता।
प्रजा की सेवा करती विधाता॥
लव कुश को वाल्मीकि आश्रम जाई।
दोनों पुत्रों को जन्म दिया माई॥
वाल्मीकि ने रामायण सिखाई।
लव कुश ने अयोध्या में गाई॥
राम ने पुत्रों को पहचाना।
सीता को लेने आए जाना॥
धरती माता की गोद में समाई।
पतिव्रता का आदर्श दिखाई॥
सीता माता पतिव्रता शिरोमणि।
नारी धर्म की तुम हो आभूषणि॥
त्याग तपस्या की मूर्ति हो माता।
सहनशीलता की देवी विधाता॥
स्त्री शक्ति का प्रतीक तुम हो।
आदर्श पत्नी का रूप तुम हो॥
जो नारी सीता को ध्यावे।
सुखी दाम्पत्य निश्चय पावे॥
विवाह में बाधा दूर हो जावे।
योग्य वर माता दिलावे॥
पति पत्नी में प्रेम बढ़ावे।
गृहस्थी में सुख समृद्धि लावे॥
संतान सुख की प्राप्ति होवे।
परिवार में आनंद भोवे॥
सीता चालीसा जो नित पढ़े।
सुखी जीवन उसका सदा रहे॥
दाम्पत्य जीवन मंगलमय होवे।
सीता कृपा से सब सुख भोवे॥
॥ दोहा ॥
सीता चालीसा पढ़े जो कोय।
सुखी दाम्पत्य निश्चय होय॥
विवाह बाधा दूर हो जावे।
सीता माता कृपा बरसावे॥
॥ जय सियाराम ॥
॥ इति श्री सीता माता चालीसा समाप्त ॥