॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
॥ चौपाई ॥
जय जय श्री शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चार भुजा तनु श्याम विराजे।
माथे रतन मुकुट छवि छाजे॥
परम विशाल मनोहर भाला।
नील वसन धारे विकराला॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल पल करें दुष्ट संहारा॥
पिंगल नयन भृकुटि अति टेढ़ी।
दिन की कठिन दशा किंवा मेढ़ी॥
सूर्य पुत्र छाया मइया जाये।
यम अनुज अभिन्न बताये॥
क्रोधी रूप अहो ममता धारी।
करत सबन पर दया अपारी॥
कर्म सुकर्म विचारत जो नर।
देत फल उनके यथा तत्पर॥
जो जन आपहिं भजे भवानी।
ते न करत कछु भूल गलानी॥
राहु केतु संग देव गणत्व।
भर्मण करत सदा गुरु शनित्व॥
धरत रूप सबकी गति जानैं।
कर्मफल देते अघ अभिमानी॥
अति बलशाली तेज तुम्हारा।
सुर नर असुर सहें अधिकारा॥
तीनो लोक तुम्हारो ध्यावे।
ग्रह गण मध्य रहै डर पावे॥
शनि के रोग सकल बिनसाहीं।
भक्ति भाव से जो जन गाहीं॥
व्याधि विनाशत काज सुधारे।
तुम बिन सबके विपदा टारे॥
रावण ऊपर प्रभु तुम धारी।
तिहि अवसर की बात निहारी॥
लंकापति पर तुम जब ढाये।
मान अभिमान सकल छल जाये॥
भीमसेन की आर्ति मिटाये।
भक्त वात्सल्य तुम सब पाये॥
राम तिलक बिन शनि निज धाये।
प्रभु के सब हित साध बनाये॥
वृषभ रूप धारि सबको तारे।
करुणानिधि भव बंधन टारे॥
जब नृप विक्रम ऊपर आये।
सब प्रकार से तिनको सताये॥
तेली भये रहे जन समान।
लई परीक्षा धारि ध्यान॥
जब विक्रम भये साढ़ेसाती।
तब तुम कीन्हीं अति कुसलाती॥
वाहन मीन मयूर विहंगा।
गीध जंबुक गज तुरंगा॥
सप्त वाहन राशि में राजे।
करते मंत्री नृप सब काजे॥
जो चालीसा भक्ति से गावें।
कष्ट सकल दूर वे पावें॥
शनिवार व्रत जो नर करहीं।
वे सब पाप शनि जी हरहीं॥
सूर्य पुत्र प्रभु आरति गाउं।
अंतर हृदय तुम्हारो ध्याऊं॥
श्री शनि चालीसा नित गावें।
कष्ट मिटे सब मंगल पावें॥
मेरी विनय शनि सुन लीजिए।
ऋण दारिद्र दूर कर दीजिए॥
॥ दोहा ॥
पाठ करे चालीसा, मिटे सकल भय रोग।
सुख सम्पत्ति प्रभु कृपा, शनि आरति में जोग॥
॥ इति श्री शनि चालीसा समाप्त ॥