॥ दोहा ॥
श्री रघुबर को ध्यान धरि, पावन मन करि आज।
श्री रघुवीर चालीसा कहूँ, पाप करन को साज॥
॥ चौपाई ॥
जय राम सदा सुखधाम हरे।
रघुनायक सायक चाप धरे॥
भव बारन दारन सिंह प्रभो।
गुण सागर नागर नाथ विभो॥
प्रभु दीन दयाल दशानन हन।
अघ खंडन पंडित मोह मदन॥
तुम कृपालु कौशल राज कुमार।
सुर नर मुनि बंदित पाप विदार॥
तुम कौशल्या के हितकारी।
जय दशरथ के प्राण पियारी॥
पितु वचन धारि बन पंथ पगे।
जहं राच्छस भूप कराल रगे॥
खर दूषण मारि त्रिशिरा हनी।
महाबीर बिराज प्रभा घनी॥
तुम शूर्पणखा की नाक कटी।
मारीच पटकि खल राच्छस घटी॥
पटक्यो मारीच कपट मृग रूप।
जेहि बध्यो खल रावण भूप॥
तुम जटायु को मुक्ति प्रदानी।
सुग्रीव मित्रता जग में मानी॥
अंगद हनूमान संग लई।
कपि सेन समुद्र तीर गई॥
तुम नल नील से सेतु बनायो।
लंका पर चढ़ि दल जाकर छायो॥
राम रावण युद्ध भयो भारी।
जीते रावण प्रभु बल धारी॥
विभीषण को राज्य दियो लंका।
चले अयोध्या जय जयकारा॥
अयोध्या में राज्य सम्हारो।
प्रजा सहित सब ही सुख पायो॥
राम राज्य भयो शुभ बेला।
दूर भये सब कष्ट कचेला॥
भरत लखन अरु शत्रुघ्न भाई।
सेवा करहिं सदा मन लाई॥
सीता सहित राज पद पायो।
जग में यश अपना फहरायो॥
तुम त्रिभुवन के स्वामी कहावो।
भक्तन के संकट हर नाशो॥
तुम भक्तन के प्राण अधारा।
तुम बिना कौन करे उबारा॥
मोह माया सब दूर करो।
मन की इच्छा सब पूर करो॥
जो यह चालीसा पढ़े पढ़ावे।
सब सुख सम्पत्ति ताहि पावे॥
राम नाम जो जपे सदा ही।
दुःख दरिद्र ताके निकट नाहीं॥
भूत पिशाच निकट नहीं आवे।
राम नाम जो मन में लावे॥
संकट कटे मिटे सब पीरा।
जो सुमिरे राम रघुबीरा॥
राम राम जो जपे निरंतर।
मिले मुक्ति सुख बसे जन अंतर॥
राम जपत जग जीवन जागे।
काल फांस सब दूर भागे॥
राम भजत संसार तरे।
जन्म जन्म के पाप हरे॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
सब सुख करने तुम त्रैलोक त्राता॥
पातक पुंज विदारण सक्षम।
राम नाम सब से उत्तम॥
दीन जन को दुख हरने वाले।
भव से पार उतारने वाले॥
राम नाम है सुख का सागर।
राम नाम है भव भय नागर॥
राम राम रट सदा रसना।
तब मिट जाये दुख की वासना॥
करहु कृपा प्रभु अपनी दासा।
पूरण करहु मन की आसा॥
तुम सम दयालु कोऊ नहीं दूजा।
सब पर कृपा करहु रघुराजा॥
मम जीवन तुम ही आधारा।
तुम बिन प्रभु मैं दीन बेचारा॥
जय राम जय राम जय सीताराम।
जय राम जय राम जय राधेश्याम॥
राम चालीसा पढ़हि जो कोई।
सब सुखी होय संकट न होई॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय में डेरा॥
राम नाम निशिदिन जो गावे।
सो परम पद निश्चय पावे॥
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
॥ इति श्री राम चालीसा समाप्त ॥