॥ दोहा ॥
जय जय परशुराम प्रभु, विष्णु अवतार महान।
भृगुकुल भूषण वीर वर, करहु कृपा भगवान॥
॥ चौपाई ॥
जय परशुराम जय भृगुनंदन।
जय जमदग्नि सुत मुनि वंदन॥
जय रेणुका के प्यारे लाला।
जय विष्णु अवतार विशाला॥
परशु हाथ में धारण किये।
क्षत्रिय कुल का मान हरे लिये॥
जटाधारी तपस्वी महान।
ब्रह्मतेज क्षात्रवीर्य निधान॥
भृगुवंशी ऋषि कुल में जन्मे।
शिव भक्त परम तप में रमे॥
महादेव से परशु पायो।
परशुराम नाम जग में छायो॥
धनुर्विद्या में पारंगत।
शस्त्र शास्त्र में अति निपुणत॥
कार्तवीर्य ने पिता को मारा।
क्रोधित हो तुम किया विचारा॥
सहस्रबाहु को युद्ध में मारो।
पिता का प्रतिशोध तुम धारो॥
इक्कीस बार पृथ्वी नि:क्षत्रिय।
किया प्रचंड पराक्रम अत्रिय॥
क्षत्रिय राजा अधर्म करते।
प्रजा को बहुत कष्ट देते॥
दुष्ट राजन का किया विनाश।
धर्म स्थापना की रखी आश॥
समंतपंचक में रुधिर भरा।
पितृ तर्पण से पाप हरा॥
कश्यप मुनि को भूमि दान दी।
महेंद्र पर्वत पर वास लिया॥
सप्त चिरंजीवी में एक तुम।
आज भी विद्यमान परम सुखधाम॥
भीष्म द्रोण कर्ण को पढ़ाये।
धनुर्विद्या का ज्ञान सिखाये॥
गुरु द्रोण को अस्त्र विद्या दी।
महान धनुर्धर की उपाधि दी॥
भीष्म पितामह के तुम गुरु।
शस्त्र शिक्षा दी अति अनुकूल॥
कर्ण को भी शिक्षा दी भारी।
किंतु छल से पायी वो न्यारी॥
श्राप दिया कर्ण को तुमने।
झूठ बोला था वो तुम सुमने॥
राम जी से हुआ मिलन प्यारा।
शिव धनुष भंग देखा न्यारा॥
वैष्णव धनुष राम को दिया।
अपना अहंकार तजि दिया॥
विष्णु अवतार राम को जाना।
तपोवन को गमन किया प्राणा॥
कलियुग में भी तुम विद्यमान।
महेंद्र पर्वत पर करते ध्यान॥
कल्कि अवतार को शिक्षा दोगे।
अधर्म नाश में साथ होगे॥
ब्राह्मण धर्म के रक्षक स्वामी।
वेद वेदांग के ज्ञाता नामी॥
क्षात्र धर्म में भी पारंगत।
दोनों धर्म में अति निपुणत॥
क्रोध में प्रचंड शांति में संत।
दुष्टों के लिये काल अनंत॥
माता भक्त पिता के सेवक।
मातृ पितृ भक्ति के पालक॥
पिता आज्ञा से माता का शीश।
काटा फिर जीवित किया सतीश॥
आज्ञाकारी पुत्र महान।
पितृ भक्ति का दिया उदाहरण॥
जो जन परशुराम को ध्यावे।
शत्रु भय से मुक्ति पावे॥
वीरता और साहस पावे।
जीवन में विजय हो जावे॥
अन्याय के विरुद्ध लड़ने की।
शक्ति मिले धर्म पर चलने की॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सब।
पूजें परशुराम को हर तब॥
अक्षय तृतीया तिथि जन्म दिवस।
पूजन करें भक्त मन उल्लास॥
परशुराम जयंती पर पूजा।
करें सभी मिल कर न दूजा॥
परशुराम चालीसा जो गावे।
वीरता पराक्रम सब पावे॥
शत्रु भय से रहे निडर।
जीवन में पावे जय जयकर॥
जय परशुराम जय भृगुनंदन।
जय जय जय भगवान मुनि वंदन॥
॥ दोहा ॥
परशुराम चालीसा पढ़े जो कोय।
वीर पराक्रमी निश्चय होय॥
शत्रु भय से मुक्त रहे सदा।
परशुराम कृपा पावे सर्वदा॥
॥ जय श्री परशुराम ॥
॥ इति श्री परशुराम चालीसा समाप्त ॥