॥ दोहा ॥
श्री महावीर भगवान को, करूं कोटि कोटि प्रणाम।
अहिंसा सत्य धर्म के, तुम हो परम धाम॥
॥ चौपाई ॥
जय महावीर जय जिनेन्द्र स्वामी।
जय वर्धमान अंतर्यामी॥
जय तीर्थंकर चौबीसवें देवा।
जय जय करें सब देव सदेवा॥
क्षत्रियकुण्ड नगरी में जन्मे।
सिद्धार्थ त्रिशला सुत रमे॥
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी तिथि आई।
जग में प्रकट भये सुखदाई॥
जन्म से पूर्व माता ने देखे।
सोलह स्वप्न शुभ मंगल लेखे॥
इन्द्र ने किया जन्म अभिषेक।
सुमेरु पर्वत पर किया विवेक॥
बाल्यकाल से वैराग्य धारी।
त्याग तपस्या की अधिकारी॥
तीस वर्ष की आयु में त्यागी।
राजपाट सब कुछ विरागी॥
दीक्षा ली और तप में लागे।
मोह माया सब दूर भागे॥
बारह वर्ष कठोर तप किया।
कर्मों का क्षय सब कर लिया॥
साढ़े बारह वर्ष में ज्ञान।
केवल ज्ञान पाया महान॥
ऋजुबालुका नदी के तीरे।
शाल वृक्ष नीचे ध्यान गंभीरे॥
वैशाख शुक्ल दशमी को पाया।
केवल ज्ञान जग में छाया॥
जिन बने तुम जितेन्द्रिय स्वामी।
राग द्वेष जीते अंतर्यामी॥
अहिंसा परमो धर्म बताया।
सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्य सिखाया॥
अपरिग्रह का मार्ग दिखाया।
पंच महाव्रत जग को सिखाया॥
जियो और जीने दो कहा।
सबको समभाव से चाहा॥
क्रोध मान माया लोभ त्यागो।
मोक्ष मार्ग पर सब जन जागो॥
अनेकांतवाद का ज्ञान दिया।
स्याद्वाद सिद्धांत जग को दिया॥
सम्यक दर्शन ज्ञान चरित्र।
तीन रत्न दिये अति पवित्र॥
गौतम गणधर प्रमुख शिष्य।
चंदना आर्यिका भक्त विशिष्ट॥
ग्यारह गणधर तुम्हरे साथी।
चौदह सहस्र साधु संगाती॥
छत्तीस सहस्र आर्यिका पावन।
लाखों श्रावक श्राविका भावन॥
तीर्थंकर चतुर्विध संघ बनाया।
धर्म प्रचार जग में फैलाया॥
तीस वर्ष उपदेश दिया जग में।
करुणा प्रेम बांटा हर पग में॥
बहत्तर वर्ष की आयु पाई।
पावापुरी में निर्वाण पाई॥
कार्तिक कृष्ण अमावस्या आई।
मोक्ष पद को तुमने पाई॥
दीपावली को निर्वाण पाया।
जग में दीप उत्सव मनाया॥
जो जन महावीर को ध्यावे।
राग द्वेष से मुक्ति पावे॥
क्रोध शांत हो मन निर्मल हो।
जीवन में सुख शांति फल हो॥
अहिंसा का पालन जो करता।
भय शोक से वह मुक्त रहता॥
सत्य मार्ग पर जो जन चले।
सदा सुखी वह जीवन जले॥
लोभ त्यागे जो मन से सारा।
संतोष पावे जीवन न्यारा॥
ब्रह्मचर्य का पालन करता।
तेज ओज से जग में भरता॥
अपरिग्रह से मुक्त रहे जो।
सुख शांति पावे वो तो॥
जैन धर्म का मार्ग सुहाना।
महावीर ने जग को बताना॥
सबके प्रति करुणा भाव रखो।
जीवन में सदा सत्य भाव रखो॥
महावीर चालीसा जो गावे।
शांति संतोष सदा वो पावे॥
राग द्वेष से मुक्त हो जावे।
मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ जावे॥
॥ दोहा ॥
महावीर चालीसा पढ़े जो कोय।
शांति संतोष मन में होय॥
अहिंसा सत्य मार्ग पर चले।
जीवन में सदा सुखी फले॥
॥ णमो अरिहंताणं ॥
॥ इति श्री महावीर चालीसा समाप्त ॥