॥ दोहा ॥
श्री कुबेर धनपति देव को, करूं कोटि कोटि प्रणाम।
धन वैभव के दाता प्रभु, पूर्ण करो सब काम॥
॥ चौपाई ॥
जय कुबेर जय धनपति राजा।
जय यक्षराज जगत के राजा॥
जय धनदा जय धन के दाता।
जय नवनिधि के तुम विधाता॥
विश्रवा ऋषि के पुत्र सुजाना।
इलविला माता से उत्पन्न महाना॥
रावण का भ्राता तुम कहलाये।
किंतु धर्म मार्ग पर सदा छाये॥
ब्रह्मा जी की कठोर तप किया।
अमर पद और धनपति पद लिया॥
ब्रह्मा ने वर दिया महान।
धन का स्वामी बने निधान॥
उत्तर दिशा के दिक्पाल।
यक्षों गुह्यकों के प्रतिपाल॥
अलकापुरी में निवास तुम्हारा।
धन वैभव से भरा नजारा॥
पुष्पक विमान से करो विहार।
गगन मार्ग में छवि अपार॥
स्वर्ण सिंहासन पर विराजे।
मणि माणिक्य मुकुट शोभा छाजे॥
गदा और थैली कर धारी।
धन वर्षा करने वाले सुखकारी॥
नवनिधि के तुम हो अधिकारी।
पद्म महापद्म निधि धारी॥
शंख मकर कच्छप निधि पाये।
मुकुंद कुंद नील निधि छाये॥
खर्व निधि भी तुम्हारे पास।
नवों निधि का तुम में वास॥
शिव भक्त परम तुम कहलाये।
महादेव से वर पाये॥
शिव जी के परम मित्र बताये।
कैलाश के निकट निवास पाये॥
रावण ने लंका छीन लई।
अलकापुरी में बसे तभई॥
पुष्पक विमान भी ले गया रावण।
किंतु धर्म न छोड़ा तुमने पावन॥
राम जी की सेवा में आये।
लंका विजय में सहायता पाये॥
पुष्पक विमान राम को दिया।
अयोध्या गमन सुगम किया॥
धन दाता तुम जग में माने।
निर्धन धनवान करो जाने॥
जो जन तुम्हें भजे मन लाई।
धन धान्य से भरे खजाने पाई॥
व्यापार में लाभ दिलाते।
आर्थिक संकट दूर हटाते॥
ऋण से मुक्ति तुम दिलाते।
दरिद्रता दूर भगाते॥
धन का सदुपयोग सिखाते।
लोभ लालच से बचाते॥
समृद्धि सुख वैभव देते।
भक्तों को सब कुछ देते॥
धनतेरस को पूजन होये।
कुबेर कृपा से धन सब पाये॥
दीपावली को पूजा करियो।
लक्ष्मी कुबेर को मन में धरियो॥
उत्तर दिशा में मुख कर पूजे।
धन वृद्धि हो कभी न टूटे॥
पीला वस्त्र पीला पुष्प चढ़ाये।
कुबेर प्रसन्न हो सुख पाये॥
गुरुवार को व्रत जो करते।
धन का अभाव कभी न सहते॥
कुबेर यंत्र घर में स्थापित।
करे तो धन हो सदा व्याप्त॥
कुबेर मंत्र जो जपे सदा।
आर्थिक समृद्धि पावे तदा॥
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय।
धनधान्य समृद्धि दाता आय॥
जो कुबेर को नित मन ध्यावे।
धन वैभव सब कुछ पावे॥
निर्धन धनवान हो जाये।
ऋण से मुक्त हो जाये॥
कुबेर चालीसा जो गावे।
धन धान्य समृद्धि पावे॥
आर्थिक संकट दूर हो जाये।
सुख शांति समृद्धि छाये॥
जय कुबेर जय धनपति देवा।
करहु कृपा सब करें तव सेवा॥
॥ दोहा ॥
कुबेर चालीसा पढ़े जो कोय।
धन धान्य की कमी न होय॥
आर्थिक समृद्धि सदा पावे।
कुबेर कृपा से सुख छावे॥
॥ ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ॥
॥ इति श्री कुबेर चालीसा समाप्त ॥