॥ परिचय ॥
श्री हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित है।
जब तुलसीदास जी को बाहुओं में अत्यंत पीड़ा हुई,
तब उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में यह रचना की।
यह स्तोत्र रोग निवारण में अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
॥ छंद ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं हरहु कलेस विकार॥
सिंधु तरन सिय शोध जन रावन मारन राम।
सकल सुमंगल दायक प्रनतपाल बजरंग नाम॥
खल दल मर्दन राम जसु बिबुध सुखद प्रभु एह।
सुजन सहाय मंत्र राज हर हनुमंत समेत॥
प्रनवउं पवन कुमार खल बन पावक ज्ञानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
अतुलित बलधामं हेमशैलाभ देहं।
दनुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यं॥
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि॥
गोष्पदी कृत वारीशं मशकी कृत राक्षसं।
रामायण महामाला रत्नं वंदे अनिलात्मजं॥
अंजनी गर्भ संभूतं कपीन्द्रं सचिवोत्तमं।
राम प्रेष्ठं महाप्राज्ञं वातात्मजं नमाम्यहं॥
उल्लंघ्य सिंधोः सलिलं सलीलं
यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः।
आदाय तेनैव ददाह लंकां
नमामि तं प्रांजलिराञ्जनेयम्॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
आञ्जनेयमतिपाटलाननं
कांचनाद्रिकमनीयविग्रहं।
पारिजाततरुमूलवासिनं
भावयामि पवमाननंदनं॥
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं
तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिं।
बाष्पवारि परिपूर्णलोचनं
मारुतिं नमत राक्षसांतकं॥
॥ हनुमान बाहुक ॥
सत्य सनातन राम रहस्यं
तुलसी मनवच कर्म निरस्यं।
कलिमल हरन अमंगल भंजन
तुम्हीं राम के भक्त सिरोमणि॥
नाथ साथ करि दास की बिनती।
करहु कृपा जो सदा करी ती॥
ताकौ गो निज धाम पठाई।
कसमस कीजिय दास दोहाई॥
दीनबंधु सुंदर सुखदाई।
राम दूत अतुलित बल भाई॥
अंजनी पुत्र पवन सुत धीरा।
हृदय बसहु श्री राम समीरा॥
जानसिरोमनि रामहि लायक।
स्याम सरोज नयन नभ नायक॥
सीता राम चरन रत होऊ।
पुनि पुनि प्रभु पद परसन होऊ॥
लंका दहन सुलंक निशाचर।
गहन गयंद निकंदन नागर॥
राम प्रताप जनक सुत राया।
बिन पद पंकज परसे पाया॥
प्रभु प्रताप महिमा बड़ भारी।
को कहि सके लंक जर बारी॥
सत कोटिक कपीस करि जोरी।
लंक गई रघुनाथ हथ होरी॥
तुलसिदास प्रभु तुम्हरी रेखा।
कहत राम गुन गन बड़ि देखा॥
राम चरन पंकज दृढ़ नेहू।
पुनि पुनि प्रभु पर करउं सनेहू॥
कोटि कुलिस अंगद के पाऊं।
दसन कपीसिंह पूँछ बनाऊं॥
कोटि बज्र हनुमान के घूँसा।
अंगद पूँछ कपीस के पूँछा॥
तुलसीदास की बाहु पीर से।
कष्ट कलेश मिटावहु वीर से॥
हनुमंत से दुख हरण कीजै।
दास तुलसी पर कृपा कीजै॥
रोग सोग दुख दरिद्र भय खोवा।
तासु सकल मंगल भय जोवा॥
आपने भक्तन को सब दीना।
जन प्रतिपालक कष्ट हरण कीना॥
पीर पहार सकल दुख हारी।
राम चरन सेवक हितकारी॥
राम नाम जो लेत सदाही।
दुख दारिद्र निकट नहि ताही॥
राम दूत तुम अमित बलवंता।
करहु कृपा जय जय हनुमंता॥
बार बार पद लागउं तोरे।
दुख हरि लेहु कृपानिधि मोरे॥
तुलसी बाहु बिकल अति भयऊ।
रोग निवारण करहु महान॥
अंजनी सुत बल धाम महाबल।
हरहु कलेश अमित रघुकुल बल॥
यह बाहुक हनुमान को पढ़िये।
सकल रोग व्याधि सब तजिये॥
कष्ट कलेश पीर सब जाये।
हनुमान कृपा तुरत सुख पाये॥
बाहु विकल तुलसी के जानी।
हरहु रोग हनुमंत भवानी॥
सीस नवाय विनय सुन लीजै।
दास तुलसी पर कृपा कीजै॥
राम राम सदा जपत रहूँ।
हनुमान के गुण गन सुनाउं कहूँ॥
राम नाम जपि जपि कर जाऊं।
राम चरण में निज तन पाऊं॥
॥ फल श्रुति ॥
पाठ करें हनुमान बाहुक नित्य प्रतिदिन भाई।
रोग व्याधि सब दूर होंय हनुमत कृपा पाई॥
बाहु पीर सब दूर हो मिटें कष्ट अरु रोग।
हनुमान जी की कृपा से मिले सकल सुख भोग॥
॥ इति श्री हनुमान बाहुक समाप्त ॥