॥ दोहा ॥
गुरु गोरख जगदीश को, करूं दंडवत प्रणाम।
नाथ पंथ के आदि गुरु, पूरण करो सब काम॥
मच्छिंद्रनाथ के शिष्य तुम, योगेश्वर गुणधाम।
अलख निरंजन सिद्ध गुरु, जपूं सदा तव नाम॥
॥ चौपाई ॥
जय जय गोरख नाथ गुसाईं।
योग मार्ग के तुम हो राई॥
अलख निरंजन नाम तुम्हारा।
नाथ पंथ का तुम आधारा॥
गोरखपुर में धाम सुहाना।
भक्तजन आवें दर्शन पाना॥
मच्छिंद्रनाथ के शिष्य कहाये।
योग विद्या गुरु से पाये॥
हठ योग के तुम प्रवर्तक।
सिद्ध साधना के संरक्षक॥
कुंडलिनी जागृत करावो।
योगी जन को सिद्धि दिलावो॥
नव नाथ में गोरख प्रधान।
चौरासी सिद्धों में महान॥
भस्म लगाये सारे तन में।
भगवा वस्त्र शोभित मन में॥
कान में कुंडल मुद्रा धारी।
सेली सींगी नाद उचारी॥
खप्पर हाथ में लिए विराजे।
चिमटा डमरू योगी साजे॥
जटा जूट सिर पर विराजित।
त्रिपुंड तिलक मस्तक आभासित॥
आदेश शब्द तुम्हारी वाणी।
अलख जगाओ गुरु गुणखानी॥
गोरख वाणी अमृत धारा।
सबद पद से जग को तारा॥
गोरखबानी ग्रंथ रचाये।
सिद्ध सिद्धांत पदति बताये॥
हठयोग प्रदीपिका का मूल।
गोरख योग से खिला यह फूल॥
आसन बंध मुद्रा सिखाये।
प्राणायाम की विधि बताये॥
नाद अनुसंधान का ज्ञान।
समाधि मार्ग का दिया वरदान॥
गुरु को शाप से मुक्त कराया।
स्त्री राज से गुरु को बचाया॥
रानी पद्मिनी की कथा न्यारी।
गोरख महिमा जग में भारी॥
भर्तृहरि को वैराग्य दिलाया।
राजा को योगी बनाया॥
गोपीचंद को दीक्षा दीना।
राज छोड़ योग मार्ग लीना॥
रसायन विद्या के तुम ज्ञाता।
पारद सिद्धि के तुम विधाता॥
देह सिद्धि की विद्या जाने।
काया कल्प को गोरख माने॥
अमर देह की सिद्धि पायी।
युगों युगों से महिमा गायी॥
बारह पंथ के मूल गुरु तुम।
नाथ संप्रदाय के शिखर तुम॥
जोगी जंगम सब तुम्हें मानें।
कनफटे नाथ सब तुम्हें जानें॥
तंत्र मंत्र यंत्र के स्वामी।
सिद्धि के तुम अंतर्यामी॥
अष्टांग योग के प्रवर्तक।
समाधि सिद्धि के संस्थापक॥
भैरव भैरवी साधना जाने।
काली कापालिक सब माने॥
शिव अवतार गोरख कहाये।
भोलेनाथ रूप में आये॥
सकल सिद्धि नवनिधि दाता।
भक्तों के तुम हो सुखकर्ता॥
रोग शोक भय दूर भगावे।
गोरख स्मरण से सुख पावे॥
संतान हीन को पुत्र मिलावे।
गोरख कृपा से सब सुख पावे॥
मनोकामना सब पूर्ण करावे।
गोरखनाथ भक्तों को तारे॥
मकर संक्रांति को मेला लागे।
खिचड़ी भोग गोरख मन भागे॥
गोरखपुर मठ में जो जावे।
दर्शन करत मनोरथ पावे॥
धूनी के दर्शन जो पावे।
पाप ताप सब दूर हो जावे॥
अखंड धूनी सदा जलत है।
भक्तन के मन प्रकाश करत है॥
गोरख चालीसा जो गावे।
योग सिद्धि मोक्ष पद पावे॥
जय जय गोरखनाथ भगवान।
करो कृपा दो शुभ वरदान॥
॥ दोहा ॥
गोरख चालीसा पढ़े जो कोय।
योग सिद्धि सब उन्नति होय॥
नाथ कृपा से जीवन तारे।
गोरखनाथ भक्तन के प्यारे॥
॥ आदेश आदेश ॥
॥ अलख निरंजन ॥
॥ इति श्री गोरखनाथ चालीसा समाप्त ॥