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॥ ब्रह्मा चालीसा ॥

Brahma Chalisa

॥ दोहा ॥

श्री ब्रह्मा जी को प्रणाम, सृष्टि रचैया देव।

चार मुख चार वेद धर, करूं सदा मैं सेव॥

॥ चौपाई ॥

जय ब्रह्मा जय सृष्टि विधाता।

जय चतुरानन जग के त्राता॥

चार मुख चार वेद उच्चारण।

सकल सृष्टि के तुम आधारण॥

कमल नाभि से प्रकट भये हो।

विष्णु नाभि से उत्पन्न हये हो॥

श्वेत वस्त्र धारण तन साजे।

कमंडल पुस्तक कर में राजे॥

माला अक्षमाला कर धारी।

ज्ञान स्वरूप तुम्हीं हितकारी॥

श्वेत कमल पर करत निवासा।

सावित्री संग सुख विलासा॥

हंस वाहन अति शोभा पावे।

श्वेत श्वेत जग में छवि छावे॥

त्रिमूर्ति में तुम प्रथम कहाये।

सृष्टि रचना का भार उठाये॥

चराचर जगत तुम्हीं ने रचाया।

जीव जंतु सब तुमसे पाया॥

देव दानव मानव बनाये।

पशु पक्षी सब जग में लाये॥

जल थल नभ वन पर्वत धारा।

तुमने रचा सकल संसारा॥

ऋग्वेद यजुर साम अथर्वण।

चारों वेद तुम्हारे वर्णन॥

चार मुख से चार वेद प्रकाशे।

ज्ञान ज्योति जग में परकाशे॥

मरीचि अत्रि अंगिरा पुलस्त्य।

पुलह क्रतु वशिष्ठ प्रशस्त्य॥

भृगु नारद दक्ष मनु धाता।

मानस पुत्र तुम्हारे त्राता॥

सनक सनंदन सनातन कुमार।

सनत्कुमार भी पुत्र तुम्हार॥

सरस्वती सावित्री गायत्री।

तीनों शक्ति तुम्हारी पत्नी॥

विद्या बुद्धि की तुम अधिकारी।

ज्ञान प्रदाता जग उपकारी॥

काल गणना तुमने बनाई।

युग मन्वंतर कल्प लखाई॥

सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग।

चारों युग की रचना अनुयुग॥

प्रलय काल में सब विलीन होय।

फिर सृष्टि रचो तुम हर बार सोय॥

अनंत बार जग को रचाया।

अनंत बार जग को मिटाया॥

तुम ज्ञान स्वरूप जगत पिता हो।

सकल जीव के आदि विधाता हो॥

पुष्कर क्षेत्र तुम्हारा धामा।

जहां करे भक्त तव नामा॥

कार्तिक मास पूर्णिमा आये।

पुष्कर में जन स्नान कराये॥

ब्रह्मा पूजन जो नर करहीं।

सो अज्ञान तिमिर को हरहीं॥

विद्या बुद्धि ज्ञान के दाता।

मूर्खता हरो जगत विधाता॥

जो विद्यार्थी तुमको ध्यावे।

परम ज्ञान वो निश्चय पावे॥

शास्त्र पुराण सब तुमसे जाने।

वेद वेदांग तुम्हीं से माने॥

ऋषि मुनि तव महिमा गावें।

देवता सुर नर शीश नवावें॥

सृष्टि के आदि अनादि पुराने।

तुमसे बड़ा न कोई जाने॥

विष्णु शिव संग त्रिदेव कहाये।

सृष्टि पालन संहार बनाये॥

तुम रजोगुण के अधिकारी।

सृजन शक्ति तुम्हीं हितकारी॥

जो ब्रह्मा को नित जन ध्यावे।

सो सृजन शक्ति निश्चय पावे॥

कला कौशल की शक्ति दो दाता।

नव निर्माण करें जग त्राता॥

लेखक कवि विद्वान बनावो।

ज्ञान की ज्योति मन में जगावो॥

मम मति को निर्मल तुम करियो।

अज्ञान अंधकार तुम हरियो॥

सदा सुमति दीजो विधाता।

जग जननी जग के तुम त्राता॥

ब्रह्मा चालीसा जो गावे।

ज्ञान बुद्धि विद्या सब पावे॥

सृजन कला में पारंगत होवे।

जीवन में उन्नति सब खोवे॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्मा चालीसा पढ़े जो कोय।

विद्या बुद्धि ज्ञान सब होय॥

सृजन शक्ति मन में जागे।

अज्ञान तिमिर सब दूर भागे॥


॥ इति श्री ब्रह्मा चालीसा समाप्त ॥

॥ ब्रह्मा चालीसा के लाभ ॥