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॥ भगवद्गीता चालीसा ॥

Bhagavad Gita Chalisa

॥ दोहा ॥

श्री गणेश सरस्वती, गुरु चरण को प्रणाम।

गीता माता की शरण में, पूर्ण होवे सब काम॥


कृष्ण अर्जुन संवाद, गीता ज्ञान अपार।

कुरुक्षेत्र के मध्य में, बहा ज्ञान की धार॥

॥ चौपाई ॥

जय जय गीता माता भवानी।

कृष्ण मुख से निकली अमृतवाणी॥

महाभारत का सार गीता।

पावन ग्रंथ जग में विख्याता॥

अठारह अध्याय ज्ञान भंडारा।

सात सौ श्लोक अमृत धारा॥

कुरुक्षेत्र रणभूमि माहीं।

अर्जुन को मोह हुआ जाहीं॥

स्वजन देख सम्मुख में भारी।

गांडीव धनुष छोड़ा महारथी॥

तब श्रीकृष्ण ने ज्ञान सुनाया।

अर्जुन का मोह भ्रम मिटाया॥

प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद।

युद्ध छोड़ना चाहे संवाद॥

द्वितीय में सांख्य योग बताया।

आत्मा अमर शरीर नश्वर गाया॥

कर्मयोग तृतीय में जाना।

निष्काम कर्म का भेद पहचाना॥

ज्ञान कर्म संन्यास चतुर्थ।

दिव्य ज्ञान का मार्ग समर्थ॥

पंचम में कर्म संन्यास योग।

त्याग और कर्म का संयोग॥

षष्ठम में आत्मसंयम योग।

ध्यान मार्ग से मिटे वियोग॥

सप्तम ज्ञान विज्ञान योग।

परमात्मा को जाने सब लोग॥

अष्टम में अक्षर ब्रह्म योग।

अंतकाल की विधि संयोग॥

राजविद्या राजगुह्य नवम।

परम ज्ञान का मार्ग उत्तम॥

दशम में विभूति योग कहाया।

ईश्वर की महिमा को गाया॥

विश्वरूप दर्शन एकादश।

अर्जुन ने देखा प्रभु का दश॥

भक्तियोग द्वादश में गाया।

प्रेम भक्ति का मार्ग बताया॥

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ त्रयोदश माहीं।

शरीर आत्मा का भेद जाहीं॥

गुणत्रय विभाग चतुर्दश।

सत्व रज तम के गुण प्रदर्श॥

पुरुषोत्तम योग पंचदश।

संसार वृक्ष का ज्ञान विशेष॥

दैवासुर संपद षोडश।

दैवी आसुरी गुण का लेख॥

श्रद्धात्रय विभाग सप्तदश।

तीन प्रकार की श्रद्धा विशेष॥

मोक्ष संन्यास अठारहवां।

कर्म त्याग का सार यहां॥

यदा यदा हि धर्मस्य वचन।

धर्म रक्षा हित प्रभु का दर्शन॥

कर्मण्येवाधिकारस्ते महान।

फल की चिंता त्यागो अभिमान॥

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि।

आत्मा अमर अविनाशी प्राणी॥

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।

नए वस्त्र धारण जीव जाय॥

मन्मना भव मद्भक्तो कहाया।

मुझमें मन लगा भक्त बनाया॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य वचन।

मेरी शरण आओ निश्चिंत मन॥

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो कहा।

सब पापों से मुक्त करूं यहां॥

श्रद्धावान लभते ज्ञानम्।

श्रद्धा से मिले परम विज्ञानम्॥

योगक्षेमं वहाम्यहम् कहाया।

भक्तों का बोझ प्रभु ने उठाया॥

अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्।

एकाग्र भक्त को मिले धाम॥

पत्रं पुष्पं फलं तोयम्।

भक्ति भाव से अर्पण शोभम्॥

समो अहं सर्वभूतेषु कहा।

सबमें समान ईश्वर रहा॥

ईश्वरः सर्वभूतानां वचन।

हृदय में वास करें भगवन॥

गीता पाठ जो नित्य करावे।

ज्ञान भक्ति मोक्ष पद पावे॥

गीता जयंती एकादशी धाम।

मार्गशीर्ष में पूजे श्याम॥

गीता चालीसा जो नित गावे।

कृष्ण कृपा से मोक्ष पद पावे॥

जय जय गीता माता भगवान।

करो कृपा दो ज्ञान वरदान॥

॥ दोहा ॥

गीता चालीसा पढ़े जो कोय।

ज्ञान भक्ति मोक्ष फल होय॥

कृष्ण कृपा जीवन में बरसे।

सब दुख दर्द भ्रम मिट परसे॥


॥ ॐ श्री भगवद्गीतायै नमः ॥


॥ हरि ॐ तत्सत् ॥


॥ इति श्री भगवद्गीता चालीसा समाप्त ॥

॥ श्री भगवद्गीता चालीसा के लाभ ॥

॥ भगवद्गीता का परिचय ॥

॥ गीता के 18 अध्याय ॥

॥ गीता के प्रसिद्ध श्लोक ॥

॥ गीता पाठ विधि ॥

॥ गीता मंत्र ॥

॥ गीता के मुख्य योग ॥

॥ गीता जयंती ॥

॥ गीता के प्रमुख टीकाकार ॥